संजय कुमार चौरसिया ब्यूरो रिपोर्ट बस्ती।
कलवारी, बस्ती - खेतों में फसलें लहलहा रहीं है और उन्हें बचाने के लिए क्षेत्र के सरकारी ट्युबेल की नाली टूटने से खेत तक पानी नही पहुंच पा रहा है। ऐसे में परेशान किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए निजी पम्पिंग सेट से महगीं सिचाई करने को मजबूर है। जिससे किसानों की लागत बढ़ रही है।
कुदरहा क्षेत्र में हरित क्रांति के लिए सरकार द्वारा जगह जगह राजकीय नलकूपों की स्थापना की गई थी ताकि किसान आसानी से अपने खेतों की सिंचाई कर सकें। उत्पादन बढ़ाने व किसानों को सिंचाई सुविधा सुलभ कराने के लिए सरकार द्वारा ड्रिप सिंचाई व निःशुल्क बोरिंग योजना की भी शुरुआत की गई है। वही लाखों की लागत से बने क्षेत्र के कई सरकारी ट्यूबबेल के जिम्मेदारों द्वारा लापरवाही के चलते गरीब किसानों को पिछले कई साल से अपनी फसल को किराये के साधनों से सिंचाई करना पड़ रहा है। आलम यह है कि सरकारी ट्यूबबेल के किनारे सिंचाई में लगे दर्जनों पम्पसेट सरकार की योजना को मुँह चिढ़ा रहे हैं।
कुदरहा बिकास खण्ड के उमरिया में लगा ट्यूबबेल नाली ध्वस्त होने के कारण बन्द पड़ा है। वहीं मनौवा में लगे ट्यूबबेल का नाली गूला भी पिछले छः साल से भठा पड़ा है। जिससे किसान खासा परेशान हैं। क्षेत्र के कुछ किसानों ने अपना दर्द कुछ इस तरह साझा किया।
उमरिया के उन्नतशील किसान मुखिराम चौधरी कहते हैं कि वर्ष 2012 में गाँव में लगे सरकारी ट्यूबबेल का नाली व अंडरग्राउंड नाली पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। तमाम शिकायत के बाद अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ।
किसान मोहम्मद हुसेन बताते हैं कि गाँव में लगे ट्यूबबेल की प्लास्टिक की भूमिगत नाली गुणवत्ता विहीन थी जो ट्रैक्टर के आवागमन और धान की फसल में पलेवा करते समय ध्वस्त हो गई। जिससे चार सौ एकड़ खेत की सिंचाई के लिए ट्यूबबेल पर निर्भर किसानों को लगातार किराए के साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
मनौवाँ गाँव निवासी फूलचन्द चौधरी कहते हैं कि मनौवा गाँव में लगे ट्यूबबेल का नाली व गूला पिछले 6 साल से भठ गया है। अब तो नाली के ऊपर चकरोड पट गया है। केवल ट्यूबवेल के आसपास पानी चलता है टेल तक पानी नही पहुंचता है। ट्यूबबेल पर आश्रित मनौवा, धनौवा, बखड़ौरा सहित पांच गांव के लोग निजी संसाधनों से किसी तरह से काम चला रहे हैं।
उमरिया निवासी अरविन्द चौधरी कहते हैं कि लगातार शिकायत और अधिकारियों के गणेश परिक्रमा से आजिज आ चुके हैं। यदि जल्द ही समस्या का हल नहीं निकला तो क्षेत्र के किसान आन्दोलन को बाध्य होंगे।
