रोहतास ब्यूरो अंगद जी पाठक की रिपोर्ट।।
सासाराम/रोहतास:-उपासना का महापर्व छठ पूजा शनिवार को नहाय-खाय से शुरू हुआ। रविवार को खरना का व्रत रखा गया, जिसमें विशेष प्रकार के प्रसाद बनाए गए। सोमवार को दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद व्रतधारियों ने अस्ताचलगामी सूर्य को विधिवत पूजा-अर्चना के बाद अर्घ्य अर्पित किया। आज उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह चार दिवसीय व्रत संपन्न हो जाएगा।
नगर ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी छठ पूजन की तैयारियां जोरों पर रहीं। बाजारों में पूजा सामग्री की जमकर खरीदारी हुई। कई स्थानों पर तालाबों और नदियों के किनारे छठ व्रतियों ने पूजा-अर्चना की। छठ पूजा समितियों ने अपने संसाधनों से घाटों की सफाई और सजावट की व्यवस्था की।
आचार्य पंडित बभनपुरवा निवासी अजय पाठक ने बताया कि जो भी श्रद्धालु छठ माता और सूर्य देव से इस दिन कुछ मांगते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अथर्ववेद में भी इस पर्व का उल्लेख है। माताएं अपने बच्चों और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं। इस अवसर पर कई श्रद्धालु सूर्य देव को दंडवत प्रणाम भी करते हैं, जो अत्यंत कठिन तप माना जाता है।श्रद्धालु अपने घर से कुलदेवी या देवता को प्रणाम कर दंडवत करते हुए नदी तट तक पहुंचते हैं। पहले सीधे खड़े होकर सूर्य देव को प्रणाम करते हैं, फिर पेट की ओर से लेटकर दाहिने हाथ से भूमि पर रेखा खींचते हैं- यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है। इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी माना गया है। छठ गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती अपने-अपने घर लौट आए।
सप्तमी के दिन उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ व्रत का समापन,सप्तमी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में श्रद्धालु दउरा में पकवान, नारियल, केला और मिठाई लेकर घाटों पर पहुंचते हैं। व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, फिर हाथ में अंकुरित चना लेकर षष्ठी व्रत की कथा कहते और सुनते हैं। कथा के बाद प्रसाद वितरण कर सभी अपने घर लौट आते हैं।
छठ पूजा का सबसे प्रमुख प्रसाद ठेकुआ होता है, जो गेहूं के आटे में घी और शक्कर या चीनी मिलाकर तैयार किया जाता है।
प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ पर्व------------------
छठ महापर्व न केवल आस्था और शुद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। यह पर्व समानता और सद्भाव की मिसाल है— अमीर-गरीब सभी एक साथ घाटों पर माथे पर डाला लिए सूर्य उपासना करते हैं।
सूर्य और जल की महत्ता का प्रतीक यह पर्व सृष्टि के संतुलन की ओर भी संकेत करता है। छठ पूजा को भगवान सूर्य और प्रकृति के प्रमुख अंश से उत्पन्न षष्ठी देवी की उपासना भी माना जाता है
